सार सत्र
विचारों के सार-तत्व पर केंद्रित संक्षिप्त, सघन सत्र।
मध्यस्थ दर्शन का समग्र वांग्मय एक विशाल सिन्धु के समान है — सार सत्र उस सिन्धु से बिंदु तक लौटने का, अर्थात् संपूर्ण विश्लेषण को सार रूप में संश्लेषित कर समझने का विनम्र प्रयास है। यह गहन अध्ययन से निकले निष्कर्षों को प्रस्ताव के रूप में साझा करने, परस्पर सुनने और साथ-साथ आगे बढ़ने का सह-अध्ययन है।
सार सत्र क्या है
अस्तित्व सहज मूलभूत वास्तविकताओं का जो विश्लेषण मध्यस्थ दर्शन (अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिन्तन, प्रणेता — ए. नागराज) में किया गया है, तथा उसके आधार पर मानव के जीने के स्वरूप का जो प्रस्ताव है, उसे सार रूप में समझने का यह प्रयास है। अनुभव करने की वस्तु एक ही है — सह-अस्तित्व; और समझने की वस्तुएँ भी थोड़ी ही हैं — सह-अस्तित्व, व्यवस्था और संबंध।
यह सत्र मध्यस्थ दर्शन की दस मूल पुस्तकों (चार दर्शन, तीन वाद, तीन शास्त्र) के सघन अध्ययन से तैयार की गई संक्षिप्त प्रस्तुति पर आधारित है।
किसके लिए है
सार सत्र उनके लिए है जो अध्ययन सत्रों के माध्यम से मध्यस्थ दर्शन के वांग्मय से गुजर चुके हैं तथा अस्तित्व सहज वास्तविकता के साथ जीने के विस्तृत प्रस्ताव को पढ़ व सुन चुके हैं। ऐसे अध्येताओं के अपने निष्कर्षों को सुनना और संयुक्त निष्कर्ष के साथ अभ्यास में आगे बढ़ना भी इस सत्र का सहज उद्देश्य है।
मुख्य विषय
- मध्यस्थ दर्शन का सार — ज्ञान त्रय: मानव (जीवन) का ज्ञान, अस्तित्व का ज्ञान, मानवीयतापूर्ण आचरण का ज्ञान; और उसका प्रयोजन — अखण्ड समाज, सार्वभौम मानवीय व्यवस्था
- मानव — जीवन और शरीर का सह-अस्तित्व; जीने के चार आयाम: अनुभव, विचार, व्यवहार और कार्य/व्यवस्था में भागीदारी
- अस्तित्व — अस्तित्व सह-अस्तित्व है; प्रकृति की चार अवस्थाएँ — पदार्थ, प्राण, जीव और ज्ञान अवस्था; विकासक्रम, विकास और जागृति
- जीवन — जीवन का तात्विक स्वरूप; मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि, आत्मा की क्रियाएँ; अनुभवगामी विधि से अनुभव तक की गति
- मानवीयतापूर्ण आचरण — मूल्य, चरित्र, नैतिकता; सात संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह, मूल्यांकन और उभय तृप्ति — न्याय
- व्यवस्था — मानव लक्ष्य: समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व; व्यवस्था के पाँच आयाम; परिवार से विश्व परिवार तक अखण्ड समाज एवं मानवीय परंपरा
सत्र से क्या मिलता है
- संपूर्ण वांग्मय की बिखरी हुई समझ का एक सूत्र में संश्लेषण — बिंदु रूप में दर्शन का सार
- अपने अध्ययन-निष्कर्षों को परखने, साझा करने और परिपूर्ण करने का अवसर
- समझ को जीने में उतारने की दिशा — संबंध एवं व्यवस्था पूर्वक जीने के अभ्यास की तैयारी
- सह-अध्येताओं के साथ परस्परता में आगे गति — एक-दूसरे के लिए सहयोगी होने का भाव
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