हमारे बारे में
दर्शन के प्रणेता के बारे में →मध्यस्थ दर्शन क्या है
मध्यस्थ दर्शन — जिसे हम जीवन विद्या के नाम से भी जानते हैं — वस्तुतः जीवन को तृप्ति/उत्सव पूर्वक जीने का एक मार्ग बताती है। यह मानव चेतना के विकास की एक सहज प्रक्रिया है, जो किसी मत, सम्प्रदाय या वाद से परे, अनुभव के आधार पर जीने की कला सिखाती है।
मध्यस्थ दर्शन के बारे में
मध्यस्थ दर्शन अस्तित्व की सच्चाईयों को समझने का एक सुगम रास्ता है। इसके प्रणेता श्रद्धेय ए. नागराज जी हैं। यह दर्शन मनुष्य को स्वयं को समझने का एक अवसर प्रदान करता है तथा परिवार, समाज, राष्ट्र और पूरी धरती पर मानव और शेष प्रकृति के साथ पूरक होकर जीने का एक मार्ग दिखाता है।
"अस्तित्व सह-अस्तित्व के रूप में नित्य वर्तमान है।"
इस यात्रा में हम शिविरों के माध्यम से स्वयं, परिवार, समाज एवं प्रकृति को एक व्यापक तथा पूरकता पूर्वक एक-दूसरे से जुड़ी हुई दृष्टि से समझने का प्रयास करते हैं।
स्वयं के अर्थ में
स्वयं के अर्थ में देखें, तो यह हर मानव को उसकी मूल चाहना — "निरंतर सुख-समृद्धि पूर्वक जीना" — को समझने का एक अवसर प्रदान करती है तथा आज के परिवेश में भी निरंतर सुख-समृद्धि पूर्वक कैसे जिया जा सकता है, इसके उपाय सुझाती है।
परिवार के अर्थ में
पारिवारिक दृष्टि से देखें, तो यह माता-पिता, सास-ससुर, भाई-बहन, पति-पत्नी, जेठानी-देवरानी-ननद, बच्चों तथा अन्य रिश्तेदारों के साथ विश्वास, सम्मान, स्नेह जैसे भावों के साथ तृप्ति पूर्वक जीने का रास्ता दिखाती है और एक-दूसरे का सहयोग करते हुए गलतियों को भी सम्मान और स्नेह के साथ कैसे ठीक किया जाए — इस पर समाधान देती है।
समाज के अर्थ में
सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यह ग्राम/मोहल्ला से शुरू कर पूरे विश्व की शिक्षा (education), स्वास्थ्य (health), न्याय (justice), उत्पादन (production) व विनिमय (exchange) व्यवस्था का स्वरूप क्या हो — ताकि हर मानव समाधान, समृद्धि, अभय व सह-अस्तित्व/परस्पर-पूरकता पूर्वक जी सके — इस पर विमर्श करती है तथा संक्रमण (transition) के कुछ शुरुआती कदम सुझाती है।
प्रकृति के अर्थ में
प्रकृति-प्रेमियों की नजर से देखें, तो मध्यस्थ दर्शन हवा, पानी, मिट्टी, पेड़-पौधे तथा पशु-पक्षियों के साथ पूरकता को समझने में सहयोग करती है और सदुपयोग की मानसिकता विकसित करती है — ताकि हम प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग जैसी विपदाओं से निजात (मुक्ति) पा सकें और मानव जाति चिर-काल तक धरती पर प्रकृति का एक अविभाज्य हिस्सा बन कर जी सके।
शरीर के अर्थ में
शरीर के संदर्भ में यह दर्शन स्वस्थ बने रहने के लिए संतुलित आहार-विहार, दिनचर्या, श्रम व विश्राम का संतुलन, आसन-प्राणायाम के साथ-साथ अपने भावों व विचारों को भी संतुलित रखने की कला सिखाती है; क्योंकि शारीरिक स्वास्थ्य के मूल में मानसिक स्वास्थ्य भी है ही।
आध्यात्मिक अर्थ में
आध्यात्मिक दृष्टि से देखें, तो यह आत्मा-परमात्मा जैसे जटिल एवं रहस्यमयी मुद्दों का एक तर्क-संगत व व्यावहारिक उत्तर प्रदान करती है, जिसे हर सामान्य मानव समझ सकता है, जी सकता है एवं दूसरों को समझने में सहयोग कर सकता है।
दर्शन के प्रणेता के बारे में
मध्यस्थ दर्शन का प्रतिपादन श्रद्धेय ए. नागराज जी ने किया है। आपका जन्म 14 जनवरी 1920 को कर्नाटक प्रांत में हुआ। बचपन से ही आपकी जिज्ञासु प्रवृत्ति थी। अपनी जिज्ञासा की पूर्ति के क्रम में अपने गुरु श्रद्धेय चंद्रशेखर भारती जी (शृंगेरी मठ के शंकराचार्य) की प्रेरणा से आपने अमरकंटक में नर्मदा नदी के उद्गम स्थल पर साधना की। साधना की उपलब्धि के रूप में आपको जो बातें समझ में आयीं, उन्हें आपने स्वयं जीने तथा लोगों के साथ साझा करने का प्रयास किया। हर मानव समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व पूर्वक जी सके, इसी अपेक्षा में आपका समस्त प्रयास रहा। 5 मार्च 2016 को शरीर शांत होते तक आप इसी हेतु सतत संलग्न रहे।