अभ्यास सत्र
समझ को दैनिक जीवन में उतारने हेतु निरंतर अभ्यास।
मध्यस्थ दर्शन (जीवन विद्या) की समझ को केवल सुनने-पढ़ने तक सीमित न रखकर अपने जीने में उतारना — यही इस सत्र का हृदय है। अध्ययन-अभ्यास सत्र का उद्देश्य है मध्यस्थ दर्शन की सूचनाओं को अभ्यास पूर्वक अपने अंतः और बाह्य आचरण में लाना, ताकि समझने के साथ-साथ स्वयं में बदलाव भी हो।
अभ्यास क्या है
अभ्यास का सीधा-सा अर्थ है — जितना हम जानते हैं, उतना जी लेना। यह अभ्युदय (व्यक्तिगत और सामाजिक शुभ) की प्राप्ति के लिए आकांक्षा एवं हर्ष पूर्वक किया गया प्रयास है; जाने हुए को मानना और माने हुए को जानना। केवल वैचारिक स्पष्टता से फल नहीं मिलता — प्रक्रिया-अनुसार करने से, ईमानदारी और निष्ठा पूर्वक जीने से ही मिलता है। यह आस्था विधि नहीं, अध्ययन विधि है — मानने के बदले निरीक्षण, तर्क और जीने के फल-परिणाम से जाँच-परख करने का मार्ग।
अभ्यास कैसे करें
सत्र में अभ्यास की मूल प्रक्रिया के रूप में अस्तित्व की मूलभूत सच्चाईयों का निरंतर ध्यान बनाये रखते हुए अपने भाव में स्नेह व प्रेम तथा विचार में पूरकता के अर्थ में समाधान को सुनिश्चित करने के उपायों पर चर्चा होती है, ताकि हम परिवार, समाज व कार्य-स्थल में तृप्ति पूर्वक जी सकें।
- अध्ययन (श्रवण/पठन) — शास्त्र-पठन एवं व्यक्ति-श्रवण से प्रस्ताव को ग्रहण करना और उसके सारभूत भाग को स्मरण में रखना
- जाँच — प्रस्ताव को अपने में परखना: क्या यह तर्कसंगत है? जीने के सभी आयामों में पूरा पड़ता है? क्या ऐसा जीना मुझे तृप्त करता है और सर्व-शुभ के अर्थ में है?
- अवलोकन (निरीक्षण) — स्वयं की स्वीकृति, भाव, विचार और आचरण का ईमानदार निरीक्षण; दूसरे का नहीं, स्वयं का मूल्यांकन
- तदनुरूप जीना — जो सही पाया उसमें दृढ़ता पूर्वक जीना; जो सही नहीं पाया उसे बदलने का सजग अभ्यास
- साक्षात्कार-बोध-अनुभव — इस क्रम के अनंतर वास्तविकताओं को स्वयं में देखने का प्रयास, जिससे अनुभव तक पहुँचा जा सके
इसमें असंग्रह, स्नेह, सरलता, अभय जैसे नियमों तथा विश्वास, सम्मान, कृतज्ञता, गौरव जैसे भावों का दैनिक जीवन में — परिवार और नजदीकी संबंधों में — अभ्यास कराया जाता है। साथ ही अभ्यास-क्रम में आने वाली बाधाओं (राग, द्वेष, आलस्य, अहंकार आदि) और उनके निराकरण पर भी चर्चा होती है।
किसके लिए है
यह सत्र उनके लिए है जो मध्यस्थ दर्शन का प्रारंभिक परिचय पा चुके हैं और अब समझ को अपने आचरण में उतारना चाहते हैं। जो स्वयं, परिवार तथा समाज में जीते हुए बदलाव के इच्छुक हैं — वे आज जहाँ खड़े हैं, वहीं से यात्रा शुरू कर सकते हैं। दूसरों से तुलना की आवश्यकता नहीं; अपनी ही प्रगति देखनी है।
अभ्यास से क्या मिलता है
- विचार व्यवस्थित होना, समाधान पूर्वक सोच पाना
- संबंधों में न्याय — विश्वास, सम्मान, स्नेह पूर्वक जीने से उभय सुख
- नकारात्मक भावों (भय, क्रोध, शिकायत) से क्रमशः मुक्ति
- संस्कारों में गुणात्मक परिवर्तन और जीने में सहजता व स्थिरता
- अनुभव, विचार, व्यवहार एवं व्यवसाय में एकसूत्रता — यही व्यक्तिगत अभ्युदय है
संबंधित वीडियो
अध्ययन-अभ्यास सत्र, भीलवाड़ा (पूरी शृंखला)
अध्ययन-अभ्यास सत्र, विजापुर (गुजरात) — पूरी शृंखला